अवलोकन

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विश्‍व बदलाव चरण में है और ऊर्जा इसके केंद्र में है। भारत वर्ष 2000 के बाद से वैश्विक ऊर्जा मांग में लगभग 10% वृद्धि के लिए जिम्‍मेदार रहा है। इस अवधि में भारत की ऊर्जा मांग लगभग दोगुनी हो गई है, जिससे वैश्विक मांग में देश की हिस्सेदारी 2013 में बढ़कर 5.7% तक पहुंच गई है जो शताब्दी की शुरुआत में 4.4% थी। भारत में ऊर्जा की प्राथमिक मांग 2000 में लगभग 441 मिलियन टन तेल समकक्ष (टीओई) से बढ़कर 2013 में लगभग 775 मिलियन टीओई हो गई है। यह अपेक्षित है कि यह 2030 तक लगभग 1250 (अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी द्वारा अनुमानित) से लेकर 1500 (समेकित ऊर्जा नीति रिपोर्ट में अनुमानित) मिलियन टीओई तक बढ़ने का अनुमान है। भारत की ऊर्जा खपत 2000 से लगभग दो गुनी हो गई है और इसमें तेजी से आगे भी वृद्धि की अपार संभाव्‍यता है। चूंकि घरेलू ऊर्जा उत्‍पादन में वृद्धि भारत की खपत जरूरतों से काफी कम है। वर्ष 2040 तक प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्‍सा 2013 में 32 प्रतिशत से बढ़कर आयात किया जाएगा। यह नोट किया जाए कि दुनिया में कोई भी देश कम से कम 4 टीओई प्रति व्यक्ति की वार्षिक ऊर्जा आपूर्ति के बिना 0.9 या इससे अधिक का मानव विकास सूचकांक प्राप्त नहीं कर सकता है। परिणामस्वरूप ऊर्जा सेवाओं के लिए एक बड़ी गुप्त मांग रही है जिसे पूरा करने की जरूरत है ताकि लोगों की पर्याप्त आय हो सके और वे जीवन की उचित गुणवत्ता बनाए रख सकें।

 

ऊर्जा दक्षता में सुधार से स्‍थायी विकास को प्रोत्‍साहन देने और अर्थव्‍यवस्‍था को प्रतिस्‍पर्द्धी बनाने का दोहरा उद्देश्‍य पूरा होता है। ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने की विकट चुनौतियों को पहचानते हुए और एक स्‍थायी विधि से वांछित गुणवत्ता की पर्याप्‍त और विविध ऊर्जा प्रदान करते हुए, दक्षता में सुधार लाना ऊर्जा नीति के महत्‍वपूर्ण घटक बन गए हैं। इसके अलावा, मानव जाति को हाइड्रोकार्बन के उपयोग से उत्‍पन्‍न होने वाले पर्यावरण और स्‍वास्‍थ्‍य भार ऊर्जा दक्षता एवं स्‍वच्‍छ ऊर्जा प्रणालियों की दिशा में भी मजबूर कर सकते हैं। ऊर्जा संरक्षण को घटते ऊर्जा संसाधनों के संरक्षण के विचार के साथ भी अधिक महत्‍व दिया गया है।

भारत सरकार ने अपने नागरिकों को कार्बनडाइऑक्साइड उत्सर्जन में न्यूनतम वृद्धि सुनिश्चित करते हुए ऊर्जा की मांग को पूरा करने के लिए दो दिशाओं का मार्ग अपनाया है, ताकि वैश्विक उत्सर्जन से पृथ्वी तंत्र को अपरिवर्तनीय क्षति नहीं हो। एक ओर, उत्पादन पक्ष पर सरकार ऊर्जा मिश्रण में अक्षय ऊर्जा के अधिक उपयोग को बढ़ावा देती है, जिसमें मुख्य रूप से सौर और पवन शामिल हैं तथा इसी के साथ कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों में सुपर क्रिटिकल प्रौद्योगिकियों की ओर विस्थापन किया गया है। दूसरी ओर, ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के समग्र दायरे में विभिन्न नवाचारी नीति उपायों के जरिए मांग पक्ष में ऊर्जा के दक्ष उपयोग के प्रयास किए जा रहे हैं।

ऊर्जा संरक्षण अधिनियम को 2001 में भारतीय अर्थव्यवस्था पर ऊर्जा सघनता में कमी लाने के लक्ष्य से लागू किया गया था। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) विद्युत मंत्रालय के अधीन एक सांविधिक निकाय है जो विभिन्‍न विनियामक और संवर्धनात्‍मक साधनों द्वारा अर्थव्‍यवस्‍था में ऊर्जा दक्षता के सुधार में अग्रणी बने रहने के लिए जिम्‍मेदार है।  ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) की स्थापना केन्द्र स्तर पर 1 मार्च 2002 को सांविधिक निकाय के रूप में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के कार्यान्वयन की सुविधा हेतु की गई थी। इस अधिनियम में इनके लिए विनियामक अधिदेश प्रदान किए गए हैं : उपकरण और उपस्करों के मानक तथा लेबलिंग, वाणिज्यिक भवनों के लिए ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता और ऊर्जा सघन उद्योगों के लिए ऊर्जा खपत के मानक। इसके अलावा इस अधिनियम में केन्द्र सरकार और ब्यूरो मिलकर अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता को प्रोत्साहन देते हैं और सुविधा प्रदान करते हैं। इस अधिनियम में राज्यों को अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए एजेंसियां निर्दिष्ट करने और राज्य में ऊर्जा दक्षता को प्रोत्साहन देने का निर्देश भी दिया गया है।

विद्युत मंत्रालय ने ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) के माध्यम से घरेलू लाइटिंग, वाणिज्यिक भवनों, उपकरणों के मानक तथा लेबलिंग, कृषि / नगर पालिकाओं में मांग पक्ष प्रबंधन, एसएमई और बड़े उद्योगों के क्षेत्रों में अनेक ऊर्जा दक्ष प्रयास आरंभ किए हैं, जिसमें औद्योगिक उप क्षेत्रों, एसडीए के क्षमता निर्माण आदि के लिए ऊर्जा खपत के मानकों के विकास की प्रक्रिया आरंभ की गई है।

ऊर्जा संरक्षण और ऊर्जा दक्षता को प्रोत्साहन देने की योजनाएं

1.         मानक और लेबलिंग कार्यक्रम

ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 धारा 14 के तहत केन्‍द्र सरकार को मानक और लेबलिंग (एस एण्‍ड एल) कार्यक्रम के विकास का अधिकार दिया जाता है, जो 18 मई 2006 को औपचारिक रूप से विद्युत मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आरंभ किया गया था। ऊर्जा दक्षता ब्‍यूरो (बीईई) द्वारा उपकरणों तथा उपस्‍करों के लिए ऊर्जा निष्‍पादन मानकों को परिभाषित किया जाता है और अनेक प्रशिक्षण, जागरूकता तथा क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के जरिए इसको सरलता से अपनाने और प्रोत्‍साहन देने की सुविधा प्रदान की जाती है। एस एण्‍ड एल योजना, ऊर्जा दक्षता ब्‍यूरो का भी एक प्रधान कार्यक्रम है जो उपकरण तथा उपस्‍कर ऊर्जा दक्षता में सुधार लाने तथा उपभोक्‍ता के लिए ऊर्जा की लागत में कमी लाने के लिए सर्वाधिक लागत प्रभावी नीति साधन में से एक है। लेबलों के साथ अनिवार्य ऊर्जा दक्षता मानक, जो ऊर्जा निष्‍पादन का वर्णन करते हैं, इनसे उपभोक्‍ताओं को दक्ष उत्‍पादों की खरीद का सूचित विकल्‍प मिलता है, जिससे ऊर्जा की बचत और खर्च में कमी होती है।

यह योजना 21 उपस्‍करों / उपकरणों पर लागू की गई है, 21 उपकरणों में से 8 उपकरण अनिवार्य क्षेत्र में और शेष 13 उपकरण स्‍वैच्छिक क्षेत्र में हैं।

बीईई के अधीन ऊर्जा दक्षता लेबलिंग कार्यक्रम का आशय उपभोक्ताओं को मिलने वाली सेवाओं पर बुरा असर डाले बिना उपकरण की ऊर्जा खपत में कमी लाना है। पुनः रेफ्रीजरेटर और एयर कंडीशनर के लिए मानक और लेबल को आवधिक रूप से अधिक कठोर बनाया गया है। परिणामस्वरूप कम दक्ष उत्पादों को बाजार से हटाया गया है और अधिक दक्ष उत्पाद लाए गए हैं। यात्री कारों के लिए कॉर्पोरेट औसत ईंधन खपत मानक (सीएएफसी) 3 अप्रैल 2015 को अधिसूचित किए गए हैं।

वर्तमान समय में एस एण्‍ड एल कार्यक्रम में 21 उपकरण शामिल हैं, जिसमें से 8 उपकरणों की लेबलिंग को अनिवार्य बनाया गया है। विस्‍तृत सूची निम्‍नानुसार है :

 

क्र. सं.

उपकरण

अनिवार्य उपकरण

1.             

घरेलू फ्रॉस्ट फ्री रेफ्रिजरेटर

2.             

विंडो और हाइ वॉल स्प्लिट एयर कंडीशनर

3.             

ट्यूबुलर फ्लोरोसेंट लैंप

4.             

डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफॉर्मर

5.             

सीलिंग माउंटिड और फ्लोर स्‍टैंडिंग एयर कंडीशनर

6.             

डायरेक्ट कूल रेफ्रिजरेटर

7.             

कलर टेलीविजन

8.             

स्‍टोर टाइप इलेक्ट्रिक वॉटर हीटर

स्वैच्छिक उपकरण

9.             

इंडक्शन मोटर

10.           

एग्रीकल्‍चरल पंप सेट

11.           

सीलिंग फैन

12.           

डोमेस्टिक लिक्‍वीफाइड पेट्रोलियम गैस स्टोव

13.           

वॉशिंग मशीन

14.           

कंप्यूटर (नोटबुक / लैपटॉप)

15.           

ब्लास्ट (इलेक्ट्रॉनिक / मैग्‍नेटिक)

16.           

कार्यालय उपकरण (प्रिंटर, कॉपियर, स्कैनर, एमएफडी)

17.           

कृषि प्रयोजनों के लिए डीजल इंजन संचालित मोनो सेट पंप

18.           

सॉलिड स्टेट इनवर्टर

19.           

डीजल जनरेटर

20.           

परिवर्तनीय क्षमता एयर कंडीशनर

21.           

एलईडी लैंप

1.         ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ईसीबीसी) और मौजूदा भवनों में ऊर्जा दक्षता

नए वाणिज्यिक भवनों के लिए ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ईसीबीसी) भारत सरकार द्वारा 27 मई, 2007 को अधिसूचित की गई थी। ईसीबीसी में 100 किलोवॉट के संयोजित लोड के साथ या 120 केवीए और इससे अधिक की संविदा मांग वाले नए वाणिज्यिक भवनों के लिए न्यूनतम ऊर्जा मानक तय किए गए हैं। जबकि केंद्र सरकार को ईसी अधिनियम, 2001 के तहत अधिकार है, राज्य सरकार को संहिता में स्थानीय या क्षेत्र जरूरतों के अनुसार बदलाव करने और उन्‍हें अधिसूचित करने की नम्यता है। ईसीबीसी ऊर्जा प्रदर्शन के मानदंडों को परिभाषित करता है और उस देश के जलवायु क्षेत्रों को ध्यान में रखता है जहां भवन स्थित है। भवन के प्रमुख घटक जो संहिता के माध्यम से संबोधित किए जा रहे हैं :

•      एन्‍वेलप (वॉल, रूफ्स, विंडो)

•      लाइटिंग प्रणाली

•      एचवीएसी प्रणाली

•      जल ताप और पम्पिंग प्रणाली

•      इलेक्ट्रिकल विद्युत प्रणाली

 

वर्तमान में आठ राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों (राजस्थान, उड़ीसा, पुडुचेरी संघ राज्य क्षेत्र, उत्तराखण्ड, पंजाब, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, हरियाणा, पश्चिम बंगाल) ने अपने राज्यों में इस संहिता को अधिसूचित और ग्रहण भी किया है। ऊर्जा दक्ष भवनों के लिए बाजार को आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहन देने हेतु ऊर्जा दक्षता ब्यूरो ने भवनों के लिए एक स्वैच्छिक स्टार रेटिंग का विकास किया है जो भवन में इसके क्षेत्रफल में केडब्ल्यूएच / वर्ग मीटर / वर्ष में व्यक्त ऊर्जा उपयोग के संदर्भ में भवन के वास्तविक निष्पादन पर आधारित है। वर्तमान में भवनों की चार श्रेणियों (दिन में उपयोग होने वाले कार्यालय भवन/ बीपीओ / शॉपिंग मॉल/ अस्पताल) के लिए स्वैच्छिक स्टार लेबलिंग कार्यक्रम का विकास किया गया है और इन्हें सार्वजनिक क्षेत्र में लगाया गया है। अलग-अलग श्रेणियों के तहत 150 से अधिक व्यावसायिक भवनों का मूल्यांकन किया गया है।

 

2.    मांग पक्ष प्रबंधन

 (क) कृषि मांग पक्ष प्रबंधन (एजीडीएसएम) योजना

 भारत के कृषि क्षेत्र में भारत की राष्‍ट्रीय बिजली खपत का लगभग 18 प्रतिशत व्‍यय होता है, जिसके साथ देश भर में 21 मिलियन पंप सेट चलाए जाते हैं। आंकड़े दर्शाते हैं कि हर वर्ष इस क्षेत्र में 2.5-5 लाख नए पंप सेट कनेक्‍शन जोड़े जाते हैं, इसमें से अधिकांश पंप सेट अदक्ष हैं, जिनकी औसत दक्षता 25-35 प्रतिशत है, जबकि स्‍टार रेट वाले ऊर्जा दक्ष पंप सेट (ईईपीएस) की दक्षता का स्‍तर 45-50 प्रतिशत है। अध्‍ययनों से पता लगता है कि ऊर्जा अदक्ष पंप सेटों के स्‍थान पर ऊर्जा दक्ष पंप लगाने से ऊर्जा बचत की संभाव्‍यता 25-40 प्रतिशत के स्‍तर पर मौजूद है।

कृषि क्षेत्र में ऊर्जा दक्षता को बढा़वा देने के लिए विभिन्‍न गतिविधियां की जा रही है, राज्‍य सरकारों को ईईपीएस (ऊर्जा दक्ष पंप सेट) के उपयोग का अधिदेश देने के लिए सभी नए कृषि कनेक्‍शनों के लिए राज्‍यव्‍यापी अधिसूचना जारी करने की सुविधा दी गई है। कृषि पंपों के लिए ऊर्जा दक्षता और संरक्षण पर किसानों के लिए देश व्‍यापी क्षमता निर्माण के सत्रों का आयोजन किया जा रहा है।

प्रथम कृषि मांग पक्ष प्रबंधन प्रायोगिक परियोजना को शोलापुर, महाराष्‍ट्र में कार्यान्वित किया जा रहा है जिससे 2209 पंप सेटों के दक्षता उन्‍नयन से 6.1 मिलियन यूनिट की बचत दर्शाई गई है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में 3 अन्‍य प्रायोगिक परियोजनाओं का कार्यान्‍वयन भी किया जा रहा है। कृषि सघन राज्‍यों जैसे महाराष्‍ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में बड़े पैमाने पर पंप उन्‍नयन के कार्यक्रम विभिन्‍न चरणों में हैं। इन परियोजनाओं से उल्‍लेखनीय निवेश आकर्षित किए जाएंगे और ग्रामीण तकनीशियनों को बड़े पैमाने पर रोजगार भी मिलेगा।

हरियाणा, पंजाब, केरल और कर्नाटक राज्‍यों में ऊर्जा दक्ष कृषि पंपों का उपयोग करने के लिए राज्‍यव्‍यापी अनिवार्य अधिसूचना पहले ही जारी की गई है। कुछ राज्‍य जैसे छत्तीसगढ़ और राजस्‍थान द्वारा ऊर्जा दक्ष पंप सेटों को अपनाने के लिए कृषि उपभोक्‍ताओं को प्रोत्‍साहन की पेशकश की जा रही है।

(ख) नगर निगम मांग पक्ष प्रबंधन (एमयूडीएसएम) योजना

नगर निगम क्षेत्र में ऊर्जा बचत की अपार संभाव्यता को समझते हुए बीईई ने नगर निगम मांग पक्ष प्रबंधन (एमयूडीएसएम) योजना प्रस्तावित की। बुनियादी स्‍तर पर परियोजनाओं का कार्यान्‍वयन बहुत अनिवार्य है, जिससे प्रौद्योगिकी प्रदाता, कार्यान्‍वयन करने वाले भागीदारों, वित्तीय संस्‍थानों आदि के बीच बाजार का रूपांतरण होगा। इस कार्यक्रम में देश के 134 नगर निगमों को शामिल करने की योजना बनाई गई है, जिसके लिए निवेश ग्रेड के ऊर्जा परीक्षण किए जाएंगे और एस्‍को विधि द्वारा कार्यान्‍वयन तथा विस्‍तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की जाएगी। परियोजना का मुख्य उद्देश्य शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) की समग्र ऊर्जा दक्षता में सुधार लाना था जिससे बिजली के उपभोग में काफी अधिक बचत हो सकती है, जिसके परिणामतः यूएलबी के लिए कीमत में कमी/बचत होगी।

 

प्रमुख उपलब्धियां निम्नानुसार हैं :

 

  • देश भर में 175 यूएलबी में परिस्थिति से जुड़े सर्वेक्षण किए गए थे।
  • निवेश ग्रेड ऊर्जा लेखापरीक्षा (आईजीईए) लेने के बाद 134 यूएलबी के आश्रय योग्य डीपीआर तैयार किए गए। 134 यूएलबी में ऊर्जा दक्षता परियोजना के माध्यम से बचाई गई उत्पादन क्षमता के भाग के रूप में कुल मिलाकर 120 मेगावॉट की बचत का अनुमान है।

 

बुनियादी स्तर पर परियोजना का कार्यान्वयन अत्यंत अनिवार्य है, जिससे प्रौद्योगिकी प्रदाता, कार्यान्वयन भागीदारों, वित्तीय संस्थानों आदि के बीच बाजार रूपांतरण होगा। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह प्रस्ताव दिया गया है कि 15 यूएलबी में प्रदर्शन परियोजनाओं का कार्यान्वयन 12वीं योजना के दौरान प्रायोगिक आधार पर किया जाएगा।

 

(ग) डिस्कॉम का क्षमता निर्माण

कार्यक्रम का उद्देश्य लोड प्रबंधन कार्यक्रमों, ऊर्जा संरक्षण कार्यक्रमों को चलाने, डीएसएम कार्य योजना के विकास और अपने अपने क्षेत्रों में डीएसएम गतिविधियों के कार्यान्वयन के लिए डिस्कॉम का क्षमता निर्माण करना है। इस कार्यक्रम से डिस्कॉम को अधिकतम (पीक) बिजली मांग में कमी लाने के लिए सहायता मिलेगी, ताकि वे आगे की क्षमता को लंबित कर सकें। इस योजना के तहत निम्नलिखित गतिविधियों का आयोजन किया जाता है।

·         इस योजना में भाग लेने के लिए 34 डिस्कॉमों का चयन किया गया है  और समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए हैं।

·         27 डिस्कॉमों के लिए 18 राज्यों में डीएसएम विनियम अधिसूचित किया गया है।

·         बीईई द्वारा नेशनल पावर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट को डिस्कॉम के अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन हेतु नियुक्त किया गया था ताकि इस कार्यक्रम के तहत डीएसएम पर मास्टर प्रशिक्षकों और ऊर्जा दक्षता को तैयार किया               जा सके।

·         प्रशिक्षक की प्रशिक्षण गतिविधि के अधीन 32 डिस्कॉम के 504 अधिकारियों को मास्टर प्रशिक्षक के रूप में प्रशिक्षण दिया गया है। डिस्कॉमों के सर्कल स्तर के अधिकारियों हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के लिए चार                       एजेंसियों का चयन किया गया है।

·         इन प्रशिक्षण कार्यक्रम में लगभग 5000 अधिकारियों के भाग लेने की संभावना है।

 

(घ)  छोटे और मध्यम उद्यम (एसएमई) क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता

भारत में विनिर्माण क्षेत्र एमएसएमई का 80 प्रतिशत है, जो स्‍थायी वृद्धि पैटर्न अर्जित करने के लिए एक महत्‍वपूर्ण खण्‍ड बनाता है। ऊर्जा की लागत को विनिर्माण इकाइयों के लिए एक महत्‍वपूर्ण घटक माना गया है तथा बिजली की बढ़ती लागतें, ऊर्जा दक्षता इस क्षेत्र को प्रतिस्‍पर्द्धी बनाने के लिए अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण बन गई है। भारत में एसएमई क्षेत्रों में ऊर्जा दक्ष प्रौद्येागिकियों तथा प्रचालन प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान ऊर्जा दक्षता ब्यूरो ने चुने हुए 25 एसएमई क्लस्टरों में ऊर्जा दक्षता हस्तक्षेपों की शुरूआत की। इकाई स्तर पर ऊर्जा उपयोग और प्रौद्योगिकी अंतराल, क्लस्टर विशिष्ट ऊर्जा दक्षता मैनुअल, ऊर्जा दक्ष प्रौद्योगिकियों और क्षमता निर्माण पर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने और एसएमई में शामिल मानव बल के ज्ञान संवर्धन के आकलन का अध्ययन किया गया था। 12वीं योजना के दौरान 5 एसएमई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अनुकृति को बढ़ावा देने के लिए 5 एसएमई क्षेत्रों [पाली (वस्त्र), वाराणसी (ईंट), लुधियाना (ढलाई), इंदौर (खाद्य)  और कोच्चि (समुद्री भोजन क्लस्टर)] में 10 सर्वश्रेष्ठ प्रौद्योगिकियों की 100 प्रौद्योगिकी प्रदर्शन परियोजनाओं के कार्यान्वयन की संकल्पना की गई है। सभी 5 समूहों की चयनित इकाइयों में आधारभूत ऊर्जा लेखा परीक्षा पूरा किया गया और कार्यान्वयन के लिए सबसे अच्छी ऊर्जा दक्षता प्रौद्योगिकियों की पहचान की गई है। पहचानी गई ऊर्जा दक्षता प्रौद्योगिकियों का कार्यान्वयन और कार्यान्वयन के बाद ऊर्जा लेखा परीक्षण का कार्य वाराणसी की दो इकाइयों (ईंट), लुधियाना की 7 इकाइयों (ढलाई) तथा इंदौर (खाद्य) क्लस्टर 7 इकाइयों के समूह में पूरा किया गया है।

 

3.      राज्यों की संस्थागत क्षमता का सुदृढ़ीकरण

(क) राज्य नामि‍त एजेंसियों (एसडीए) का सुदृढ़ीकरण :

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, राज्यों में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों का कार्यान्वयन और प्रवर्तन एसडीए द्वारा किया जाता है। वर्तमान तिथि पर 32 राज्यों में किसी मौजूदा संगठन को नामनिर्दिष्ट करते हुए एसडीए की स्थापना की गई है जैसा ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001 की धारा 15 (घ) में आवश्यक हैं। ये एजेंसियां हर राज्य में अलग हैं जो अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (44 प्रतिशत), विद्युत निरीक्षणालय (25 प्रतिशत), वितरण कंपनियां (12 प्रतिशत), विद्युत विभाग (16 प्रतिशत) और अन्य (3 प्रतिशत)। राज्य स्तर पर ऊर्जा संरक्षण गतिविधियों को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए एसडीए की संस्थागत क्षमताओं के निर्माण पर बल देने के लिए विद्युत मंत्रालय ने 11वीं योजना के दौरान राज्य नामित एजेंसियों को उनकी संस्थागत क्षमताओं में मजबूती लाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने की योजना को अनुमोदन दिया गया। इसके परिणाम निम्नलिखित हैं:

·          स्‍ट्रीट लाइट और पानी की पंपिंग प्रणालियों के क्षेत्रों में 59 प्रदर्शन परियोजनाओं को अब तक एसडीए द्वारा सफलतापूर्वक पूर्ण किया गया है।

·          इस समय 27 राज्‍यों द्वारा एलईडी ग्राम अभियान सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया गया है।

·          सरकारी इमारतों के आईजीईए के तहत 491 सरकारी इमारतों को बीईई द्वारा नामिकाबद्ध एस्‍को की ओर से ऊर्जा परीक्षण हेतु लिया गया है।

·          ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001 के अधिदेश के अनुसार उनकी भूमिकाओं से अवगत कराने के लिए ऊर्जा प्रबंधकों / ऊर्जा परीक्षकों और नामित उपभोक्‍ताओं को शामिल करते हुए कार्यशालाएं / प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन एसडीए द्वारा किया गया है।

·          एसडीए द्वारा सभी राज्‍यों में मीडिया / जागरूकता अभियान किए गए हैं। मीडिया के फोकस क्षेत्र इलेक्‍ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के जरिए संवर्धन, बीईई की सामग्रियों का स्‍थानीय भाषाओं में अनुवाद, स्‍कूलों / कॉलेजों में जागरूकता अभियान और विवरणिका, बैनर आदि रहे हैं।

·          अधिकांश एसडीए राज्‍य में ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने के लिए किए गए कार्यों को उचित मान्‍यता देने के साथ ऊर्जा संरक्षण दिवस का आयोजन करते हैं।

·          एसडीए द्वारा 11वीं योजना के दौरान 1065 मेगावॉट की सत्‍यापित बचाई गई क्षमता की रिपोर्ट की गई है।

 

(ख) राज्य ऊर्जा संरक्षण निधि (एसईसीएफ) योजना में योगदान :

राज्य ऊर्जा संरक्षण निधि (एसईसीएफ) ऊर्जा दक्ष परियोजनाओं के कार्यान्वयन की प्रमुख बाधाओं से उबरने का साधन है। राज्य ऊर्जा संरक्षण निधि (एसईसीएफ) के तहत अंशदान उन राज्य सरकारों/ संघ राज्य क्षेत्रों को दिया गया था जिन्होंने अपना एसईसीएफ सृजित किया है और इसके संचालन के लिए नियमों-विनियमों को अंतिम रूप दिया हुआ है। यह योजना सभी राज्यों / संघ राज्य क्षेत्रों के लिए थी जिसमें किसी राज्य/ संघ राज्य क्षेत्र के लिए अधिकतम सीमा 4.00 करोड़ रु. थी जिसे प्रत्येक 2.00 करोड़ रु. की दो किस्तों में दिया गया था। एसईसीएफ की दूसरी किस्त राज्यों को केवल तभी जारी की गई जब उन्होंने ऊर्जा दक्षता ब्यूरो की पहली किस्त के बराबर अंशदान मुहैया कराया। एसईसीएफ में अंशदान के तहत वित्तीय सहायता जारी करने की शर्तें और निबंधन 12वीं योजना के दौरान समान बने रहे, इसमें केवल पूर्वोत्तर राज्यों का अपवाद रहा। पूर्वोत्तर राज्यों के लिए राज्य सरकारों द्वारा मिलान के योगदान में 2.0 करोड़ रुपए के स्थान पर 25 लाख रुपए की छूट दी गई है। अब तक 26 राज्यों को 82 करोड़ रुपए की राशि का संवितरण किया गया है। इनमें से 15 राज्यों ने बराबर (मैचिंग) अंशदान प्रदान किया है।

 

4.     स्कूल शिक्षा कार्यक्रम

अगली पीढ़ी को ऊर्जा संसाधनों के दक्ष उपयोग के बारे में अधिक जागरूक बनाने की जरूरत को समझते हुए अनिवार्य है कि बच्चों को स्कूल शिक्षा के दौरान इसका परिचय दिया जाए। इस विषय में स्कूलों में ऊर्जा दक्षता को प्रोत्साहन देने के लिए ऊर्जा क्लबों की स्थापना की गई है। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान ऊर्जा दक्षता जागरूकता योजना के तहत छात्रों के क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का कार्यान्वयन किया जाता है और यह कक्षा 6 से 10 के लिए एनसीईआरटी की मौजूदा विज्ञान पाठ्यचर्या और विज्ञान पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने के लिए ऊर्जा दक्षता और संरक्षण पर पाठ / सामग्री तैयार करने का इच्छुक है।  

 

5.          मानव संसाधन विकास (एचआरडी)

जागरूकता सृजन द्वारा प्रक्रमों और उपकरण की ऊर्जा दक्षता के सुधार की संभाव्यता बहुत अधिक है। मानव संसाधनों के कौशलों के सृजन, प्रतिधारण और उन्नयन की एक ठोस नीति ऊर्जा दक्षता प्रौद्योगिकियों तथा प्रथाओं के विभिन्न क्षेत्रों में भेदन हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानव संसाधन विकास के तहत सिद्धांत सह अभ्यास उन्मुख प्रशिक्षण कार्यक्रम और ऊर्जा लेखा परीक्षण साधन समर्थन प्रदान करना शामिल है।

6.         राष्ट्रीय उन्नत ऊर्जा दक्षता मिशन (एनएमईईई)

राष्ट्रीय उन्नत ऊर्जा दक्षता मिशन (एनएमईईई) जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) के तहत आठ राष्ट्रीय मिशनों में से एक है। एनएमईईई का लक्ष्य प्रेरक विनियामक और नीति व्यवस्था द्वारा ऊर्जा दक्षता के लिए बाजार को मजबूत बनाना है और इसमें ऊर्जा दक्ष क्षेत्रों में नवाचारी और स्थायी व्यापार मॉडलों के पोषण की संकल्पना की गई है। मंत्रिमंडल की बैठक में एनएमईईई दस्तावेज को अनुमोदन दिया गया तथा 11वीं योजना अवधि (2010-12) की दो वर्ष की अवधि का निधिकरण 235.50 करोड़ रुपए के परिव्यय के साथ किया गया। एनएमईईई को 12वीं योजना में जारी रखने को मत्रिमंडल द्वारा 775 करोड़ रुपए के कुल परिव्यय सहित 6 अगस्त, 2014 को अनुमोदन दिया गया था। मिशन में ऊर्जा दक्षता के बाजार को आगे बढ़ाने के प्रयास बढ़ाए जाने हैं, जिसका अनुमान लगभग 74,000 करोड़ रुपए लगाया गया है। 11वीं योजना अवधि के दौरान की गई गतिविधियों से संस्थागत और विनियामक मूल संरचना बनाई गई। एनएमईईई ने ऊर्जा सघन उद्योगों में ऊर्जा दक्षता में वृद्धि के निम्नलिखित चार नए उपाय बताए हैं :

(क)         कार्य निष्‍पादन, उपलब्धि और व्यापार (पीएटी), बाजार आधारित प्रक्रिया जो ऊर्जा बचत प्रमाणन के माध्यम से ऊर्जा सघन उद्योगों में ऊर्जा दक्षता में सुधार लाने की लागत प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए एक बाजार आधारित प्रक्रिया है, जिसका व्यापार किया जा सकता है।

(ख)         ऊर्जा दक्षता हेतु बाजार रूपांतरण (एमटीईई) का प्राथमिक उद्देश्य नवाचारी उपायों के माध्यम से नाम निर्दिष्ट क्षेत्रों में उत्पादों को अधिक वहनीय बनाने के लिए ऊर्जा दक्ष उपकरणों की ओर विस्थापन में तेजी लाना है।

(ग)         ऊर्जा दक्षता वित्तपोषण मंच (ईईएफपी), ऐसी प्रक्रियाओं का सृजन करने के लिए जो भावी ऊर्जा बचत को लेकर सभी क्षेत्रों में वित्तीय मांग पक्ष प्रबंधन कार्यक्रमों में सहायता देंगी।

(घ)         ऊर्जा दक्ष आर्थिक विकास रूपरेखा (एफईईईडी), ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने के लिए राजकोषीय साधनों के विकास हेतु।

(क)      कार्य निष्‍पादन, उपलब्धि और व्यापार (पीएटी)

पीएटी योजना विशिष्‍ट ऊर्जा खपत को ऊर्जा सघन उद्योगों में कम करने का एक विनियामक साधन है, जिसके साथ अतिरिक्‍त ऊर्जा बचत के प्रमाणन के जरिए लागत प्रभावशीलता बढ़ाने हेतु एक संबद्ध बाजार आधारित प्रक्रिया है, जिसका व्‍यापार किया जा सकता है।

 

1.   पीएटी का प्रथम चक्र (2012-13 से 2014-15)

पीएटी का प्रथम चक्र 8 क्षेत्रों, जो हैं एल्‍यु‍मिनियम, सीमेंट, क्‍लोर- एल्‍कली, उर्वरक, आयरन और स्‍टील, कागज और लुगदी, ताप विद्युत संयंत्र और वस्‍त्रोद्योग में 478 औद्योगिक इकाइयों के एसईसी में कमी लाने के साथ संकल्पित किया गया था। पीएटी चक्र – 1 का समग्र ऊर्जा बचत लक्ष्‍य 6.686 मिलियन टन तेल समकक्ष (एमटीओई) 2014-15 के अंत तक रखा गया था। पीएटी चक्र – 1 की उपलब्धि 8.67 एमटीओई रही, जो सौंपे गए लक्ष्‍यों की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत समग्र उपलब्धि है। यह ऊर्जा बचत 5,635 मेगावॉट की मांग तथा लगभग 31 मिलियन टन कार्बनडाइऑक्‍साइड उत्‍सर्जन में बचत में रूपांतरित होती है।

 

2.   पीएटी का दूसरा चक्र (2016-17 से 2018-19)

पीएटी योजना को नए क्षेत्र शामिल करने के लिए व्‍यापक और मौजूदा क्षेत्रों के नए डीसी को शामिल करने के लिए गहरा बनाया गया था। पीएटी चक्र–।। के लिए तीन नए क्षेत्र अर्थात् रेलवे, रिफाइनरी और डिस्‍कॉम को अधिसूचित किया गया था। पीएटी चक्र-।। 31 मार्च 2016 को अधिसूचित किया गया है और इसका लक्ष्‍य 8.869 एमटीओई की समग्र ऊर्जा खपत में कमी लाने का रखा गया है। पीएटी चक्र-।। के तहत ऊर्जा में कमी के लक्ष्‍य सौंपे गए हैं और 621 डीसी को अधिसूचित किया गया है। इस ऊर्जा बचत से मांग में लगभग 5764 मेगावॉट  की बचत होने की आशा है।

 

व्यावसायिक रूप से योग्य ऊर्जा प्रबंधकों और लेखा परीक्षकों का एक केडर नीति विश्‍लेषण, परियोजना प्रबंधन, ऊर्जा दक्षता परियोजनाओं के निधिकरण और कार्यान्वयन के साथ प्रमाणन कार्यक्रम के माध्मय से विकसित किया जा रहा है। बीईई प्रमाणित ऊर्जा प्रबंधकों और ऊर्जा लेखा परीक्षकों के लिए एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा का नियमित आयोजन करता है और प्रशिक्षण मॉड्यूल डिजाइन किए गए हैं। अब तक ऊर्जा प्रबंधकों और ऊर्जा लेखा प्रशिक्षकों के लिए 16 राष्ट्रीय प्रमाणन परीक्षाएं सफलतापूर्वक आयोजित की गई हैं। अब भारत में 12228 प्रमाणित ऊर्जा प्रबंधक है, जिसमें से अब तक 8536 अतिरिक्त योग्यता प्राप्त प्रमाणित ऊर्जा लेखा परीक्षक हैं। इसमें ‘प्रत्यायन सलाहकार समिति’ की सिफारिशों के जरिए ऊर्जा लेखा परीक्षकों के प्रत्यायन को पूरकता दी गई है। प्रत्यायित ऊर्जा लेखा परीक्षक ऊर्जा संरक्षण अधिनियम में अधिदेशित अनिवार्य ऊर्जा लेखा परीक्षण ऊर्जा सघन उद्योगों में करेंगे। अब तक 221 प्रत्यायित ऊर्जा लेखा परीक्षक हैं।

(ख)         ऊर्जा दक्षता हेतु बाजार रूपांतरण (एमटीईई) : एमटीईई के तहत दो कार्यक्रमों का विकास किया गया अर्थात् बचत लैम्प योजना (बीएलवाय) और अति दक्ष उपकरण कार्यक्रम (एसईईपी)।

(ग)      ऊर्जा दक्षता वित्तपोषण मंच (ईईएफपी) : इस कार्यक्रम के तहत, ऊर्जा दक्षता परियोजनाओं के वित्तपोषण को बढ़ावा देने के लिए ऊर्जा दक्षता ब्यूरो ने मैसर्स पीटीसी इंडिया लिमि., मेसर्स सिडबी, मेसर्स एचएसबीसी बैंक, मेसर्स टाटा कैपिटल और मैसर्स आईएफसीआई लिमि. के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। बीईई ने अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम हेतु ऊर्जा दक्षता वित्‍तपोषण पर इण्डियन बैंक एसोसिएशन के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्‍ताक्षर किए।

 

(घ)         ऊर्जा दक्ष आर्थिक विकास रूपरेखा (एफईईईडी) : इस प्रयास के तहत दो निधियां सृजन की गई हैं अर्थात् आंशिक जोखिम गारंटी निधि (पीआरजीएफईई) और ऊर्जा दक्षता हेतु उद्यम पूंजी निधि (वीसीएफईई) है।

 

क.               ऊर्जा दक्षता हेतु आंशिक जोखिम गारंटी निधि (पीआरजीएफईई) : ऊर्जा दक्षता हेतु आंशिक जोखिम गारंटी निधि (पीआरजीएफईई) ऊर्जा दक्ष परियोजनाओं के लिए वाणिज्यिक बैंकों को ऋण विस्तारित करने में शामिल जोखिम के आंशिक कवरेज सहित जोखिम बांटने की प्रक्रिया है। यह गारंटी प्रति परियोजना 10 करोड़ रुपए या ऋण राशि की 50 प्रतिशत राशि से अधिक नहीं होगी, इनमें से जो कम हों। पीआरजीएफईई के तहत सरकारी भवनों, निजी भवनों, वाणिज्यिक या बहुमंजिला आवासीय आवास, नगर पालिकाओं, एसएमई और उद्योग जैसे क्षेत्रों को कवर किया गया।

 

ख.               ऊर्जा दक्षता हेतु उपक्रम पूंजी निधि (वीसीएफईई) : निधि द्वारा एकल निवेश 2 करोड़ रुपए से अधिक नहीं होगा। निधि द्वारा विशिष्ट ऊर्जा दक्षता कार्यक्रमों को अधिकतम 15 प्रतिशत तक सीमित, अथवा अंतिम बिंदु इक्विटी सहायता विशेष प्रयोजन वाहन (एसपीवी) के माध्यम से या 2 करोड़ रुपए की राशि प्रदान की जाएगी, इनमें से जो कम है। वीसीएफईई के तहत सरकारी भवन, निजी भवनों और नगरपालिकाएं जैसे क्षेत्रों को कवर किया गया। विद्युत मंत्रालय ने वीसीएफईई के लिए न्यासी बोर्ड का गठन किया है। वीसीएफईई ट्रस्ट को वीसीएफईई के संचालन के लिए 7 जुलाई 2015 को पंजीकृत किया गया था। 

 

8.  राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार और चित्रकला प्रतियोगिता

विद्युत मंत्रालय की ओर से अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में ऊर्जा संरक्षण को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से उद्योगों और अन्य प्रतिष्ठानों को राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं तथा हर वर्ष स्कूली बच्चों के लिए आयोजित ऊर्जा संरक्षण पर वार्षिक चित्रकला प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार दिए जाते हैं।

·          राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार : ऊर्जा संरक्षण पुरस्कारों में उद्योगों, भवनों, आंचलिक रेलवे, राज्य नाम निर्दिष्ट एजेंसियों, बीईई स्‍टार लेबलयुक्‍त उपकरणों के विनिर्माताओं, बिजली वितरण कंपनियों तथा नगर पालिकाओं द्वारा ऊर्जा संरक्षण में नवाचार और उपलब्धियों को मान्यता दी जाती है और जागरूकता बढ़ाई जाती है कि ऊर्जा संरक्षण ऊर्जा की बचत के जरिए वैश्विक तापन को घटाने के लिए भारत की प्रतिक्रिया में एक बड़ी भूमिका निभाता है। इन पुरस्कारों में ऊर्जा संरक्षण और दक्षता के लिए उनकी वचनबद्धता के प्रदर्शन को भी मान्यता दी जाती है। औद्योगिक तथा वाणिज्यिक इकाइयों के बीच प्रतिक्रिया बहुत अधिक उत्साहवर्धक रही है, जो प्रतिभागिता स्तर के बढ़ने से स्पष्ट है। ईसी पुरस्कार 2016 की प्रमुख उपलब्धियां :

·            इन इकाइयों ने सामूहिक रूप से 2015 में 2598 मिलियन यूनिट की तुलना में 2016 में बिजली की 7378 लाख यूनिट की एक वार्षिक ऊर्जा बचत प्राप्त कर ली है, जो पिछले वर्ष से 2.8 गुना है। यह 2016 में बचाई गई                 उत्पादन क्षमता में 1352 मेगावॉट के समान है, जो पिछले वर्ष से बचाई गई उत्पादन क्षमता अर्थात् 486 मेगावॉट से 178 प्रतिशत अधिक है।

·            इन इकाइयों ने सामूहिक रूप से 4867 करोड़ रुपए की वार्षिक मौद्रिक बचत प्राप्त की है जबकि पिछले वर्ष वार्षिक मौद्रिक बचत 2928 करोड़ रुपए थी।

·            दो नई श्रेणियों अर्थात मेट्रो रेल और मेट्रो स्टेशनों को शामिल किया गया।

·            3 टॉप रैंक पुरस्कार, 43 प्रथम पुरस्कार, 48 द्वितीय पुरस्कार और 62 इकाइयों को योग्यता प्रमाण-पत्र के लिए चयन किया गया था

 

·            ऊर्जा संरक्षण पर स्कूली बच्चों के लिए चित्रकला प्रतियोगिता :

संरक्षण की आदत की शुरूआत स्कूली आयु में सबसे अच्छी तरह की जाती है और इसे बढ़ावा दिया जाता है। यह देखा गया है कि बच्चे बदलाव लाने वाले सर्वोत्तम कारक है और इस मामले में हमें उनकी ऊर्जा संरक्षण पर जानकारी और ज्ञान बढ़ाने तथा इस महत्वपूर्ण विषय पर उनकी दिलचस्पी पैदा करने की जरूरत है। इस विषय में, विद्युत मंत्रालय ने पहल की है और उसने वर्ष 2005 से छात्रों के लिए ऊर्जा संरक्षण पर चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया है। प्रतियोगिता को 2005 से तीन चरणों में आयोजित किया जाता है अर्थात् स्कूल, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर। इस अभियान को मजबूत बनाने के लिए मौजूदा 4, 5 और 6 कक्षाओं के छात्रों के अलावा कक्षा 7, 8 और 9 की उच्च कक्षाओं को भी इस वर्ष से शामिल किया जा रहा है। श्रेणी ‘क’ के तहत 4, 5 और 6 कक्षाओं के छात्रों और श्रेणी ‘ख’ के तहत कक्षा 7, 8 और 9 कक्षाओं के छात्रों को प्रतियोगिता में भाग लेने की पात्रता होगी। ऊर्जा संरक्षण पर राष्ट्रीय चित्रकला प्रतियोगिता 2016 को अत्यधिक सफलता मिली थी। स्‍कूल स्‍तरीय चित्रकला प्रतियोगिता में वर्ष 2015 में 1.05 करोड़ छात्रों की तुलना में वर्ष 2016 में 1.14 करोड़ छात्रों की रिकॉर्ड संख्‍या ने हिस्‍सा लिया। इस बार की प्रतिभागिता पूरे देश में ऊर्जा दक्षता ब्यूरो तथा विद्युत मंत्रालय के तहत 11 सीपीएसयू के सहयोग से आयोजित की गई। बच्चों द्वारा बनाए गए चित्रों में ऊर्जा संरक्षण गतिविधियों तथा ऊर्जा की कमी और मौसम के बदलाव के बारे में उनकी चिंताए प्रदर्शित हुई और उन्होंने अपनी प्रभावशाली तस्वीरों में प्रेरणा देने वाले विचारों को प्रभावी रूप से सम्प्रेषित किया है।